Wednesday, 27 February 2013

क्षितिज का कोना






दूर जहां मिलते हैं धरा और गगन ,
उस क्षितिज के उजालों और अंधेरों में ,
एक कोना मेरा भी है ....
स्वप्न नगरी में उड़ते हैं कितने ही ख़्वाब ,
उन में एक,
सपना सलोना मेरा भी है ....
कहते हैं हर एक रात की होती है एक सुबह ,
जागती प्रतीक्षारत आँखों को ,
एक सवेरा मेरा भी है ....
ज़मीन पर कितने घरौंदे और जाने कितने मकां ,
इन घरों में ,
एक रैन बसेरा मेरा भी है .....
बस चाहिए थोड़ी ज़मीं और ज़रा सा आसमां ,
फिर तो कहने को ,
सारा जहां मेरा ही है ....
"शैली"

9 comments:

  1. इन घरों में ,
    एक रैन बसेरा मेरा भी है .....
    बस चाहिए थोड़ी ज़मीं और ज़रा सा आसमां ,
    फिर तो कहने को ,
    सारा जहां मेरा ही है ....
    "शैली"
    बहुत सुंदर जज्बात , और उतने ही सुंदर रचना

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    1. अमरेन्द्र भाई , ब्लॉग से जुड़ने व कविता की सराहना के लिए अनेकानेक धन्यवाद :)

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  2. Replies
    1. आभार आपका। बहुत धन्यवाद।

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  3. हमेशा की तरह , बहुत सुन्दर |
    :)

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  4. इन घरों में ,
    एक रैन बसेरा मेरा भी है .....
    बस चाहिए थोड़ी ज़मीं और ज़रा सा आसमां ,
    फिर तो कहने को ,
    सारा जहां मेरा ही है ....
    "शैली"
    बहुत अच्छा भाव ,सुन्दर प्रस्तुति ,आप भी मेर ब्लॉग का अनुशरण करें ,ख़ुशी होगी
    latest post भक्तों की अभिलाषा
    latest postअनुभूति : सद्वुद्धि और सद्भावना का प्रसार

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  5. शुक्रिया कालिपद जी .आप की सराहना के लिए बहुत आभार।

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