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Monday, 25 February 2013

होली



सीस धरो तुम्हरे चरनन में ,

अब छोड़ देयो बनवारी ,

भीज गयी मोरी धानी चुनर और ,

भीजी मोरी सारी ,

मोकों काय रंगत हो कान्हा ,

बे तो , सखियन ने दी गारी ,

मैं तो तुम्हरी जनम जनम तों ,

सबहूँ ते तुमकों प्यारी ....

तज दये अबिर , गुलाल ,

पिचकारी हू भू पै डारी ,

रंग रंगी मैं तो तुम्हरे ही ,

प्रेम रस में भीजी तिहारी ...

चातक , मोर , पपीहा बोलें बन में ,

टेसूअन ने ,मादक गंध पसारी ,

फूल रही सरसों खेतन में ,

मंद मंद हंसत जाये सुकुमारी ,

गारी देत जात मन मन में ,

भरसक करत चिरौरी ,

बिनती सुनत कान्हा हंस दीन्हो ,

स्याम रंग दीन्ही बांकी गोरी ,

सब रंग रंगे बाके ही रंग में ,

ऐसी खेली होरी .......


"शैली"