सीस धरो तुम्हरे चरनन में ,
अब छोड़ देयो बनवारी ,
भीज गयी मोरी धानी चुनर और ,
भीजी मोरी सारी ,
मोकों काय रंगत हो कान्हा ,
बे तो , सखियन ने दी गारी ,
मैं तो तुम्हरी जनम जनम तों ,
सबहूँ ते तुमकों प्यारी ....
तज दये अबिर , गुलाल ,
पिचकारी हू भू पै डारी ,
रंग रंगी मैं तो तुम्हरे ही ,
प्रेम रस में भीजी तिहारी ...
चातक , मोर , पपीहा बोलें बन में ,
टेसूअन ने ,मादक गंध पसारी ,
फूल रही सरसों खेतन में ,
मंद मंद हंसत जाये सुकुमारी ,
गारी देत जात मन मन में ,
भरसक करत चिरौरी ,
बिनती सुनत कान्हा हंस दीन्हो ,
स्याम रंग दीन्ही बांकी गोरी ,
सब रंग रंगे बाके ही रंग में ,
ऐसी खेली होरी .......
"शैली"
